बनती एक नज़ीर तुम्हारी आँखों में
सुबह की किरणों सी रँगती जाती हैं
सागर सी तस्वीर तुम्हारी आँखों में
बस इसकी खातिर जीना नादानी है
मेरी सब जागीर तुम्हारी आँखों में
होली के सारे रंगों से भी ज़्यादा
त्यौहारी तासीर तुम्हारी आँखों में
अनजाने में खिंचती कोई रेखा है
अम्बर सी गम्भीर तुम्हारी आँखों में
नहीं किसी पत्री की लम्बी बाँचों में
है मेरी तकदीर तुम्हारी आँखों में
पलकों को धोकर ठहरे रहना चाहें
नीर बना सब क्षीर तुम्हारी आँखों में
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०९:४१ अपराह्न, २२ अक्टूबर २०१४