जीवन क्या है...???
एक निस्सार यात्रा,
जिससे अधिक सारगर्भित कुछ भी नहीं.
निस्संदेह,
हम जीते हैं--
एक चिर-विचारशील अवस्था में
जहां सभी बंधन
बंधहीन हो जाते हैं;
एक चिरंतन, शाश्वत तत्व का साक्षात्कार होता है,
प्रतिपल,
किन्तु
कोई अनजाना-सा गुबार
जैसे मानस को ढक लेता है
और....
आँखें बाध्य हो जाती हैं
आगे न देख सकने के लिए;
फिर..?
इस बाध्यता की पराकाष्ठा....
उस बिंदु पर
जहां अपरिमित अन्तर्निहित है,
जहां वे सब कुछ देखने को स्वतन्त्र हैं..
कैसा अजीब विरोधाभास...!!
किन्तु सत्य....!!!