Monday, September 24, 2012

...देख!!

गर्दिश-ए-ख़याल  से बाहर निकल के देख
ऐ यार मिरे! अपनी बनावट बदल के देख 


मुश्किलें हालात से पैदा नहीं होतीं
आ बैठ, ज़रा सब्र की ताक़त में ढल के देख 


रंगीन है ये दुनिया, रंगीन ज़माना
तू एक सितारे को उसकी शफ़क़  में देख 


गुस्ताख़ हैं तहज़ीब के अंदाज़ निराले
अपने अदब से इनकी आदत सँभल के देख 


दो दिन का कारवाँ है, फिर सब उजाड़ है
चल खोज, कहाँ इसमें तू है असल में देख 


बिखरा पड़ा हुआ है सब नूर इल्म का
इक बार ज़रा घर से बाहर निकल के देख 


मत कर मिजाज़पुर्सी अपने भी अक्स की
जो है तेरा 'तख़ल्लुस', उसमें पिघल के देख 

Sunday, June 26, 2011

कुछ है


..अब इस बार कुछ थोड़ा सा अलग...


न सुनने को कुछ है, न कहने को कुछ है
न तो आज दिल के बहकने को कुछ है

मेरी आरज़ू की बुलन्दी की खातिर
न दरिया मेँ कुछ है, न सहरा मेँ कुछ है

बताए ज़रा चाँद को भी तो कोई
न उसकी चमक मेँ दहकने को कुछ है

सूरज से कह दो मशालेँ जला ले
अभी और उसमेँ न जलने को कुछ है

गलतफ़हमियोँ मेँ है फूलोँ की बस्ती
कि हर पल वहाँ पर महकने को कुछ है

कँटीली सड़क पर ज़रा चल के देखो
तो मालूम होगा लहकने को कुछ है

बच्चे की किलकारियोँ की तरह से
अभी ज़िन्दगी मेँ कहकने को कुछ है

वो चिड़ियोँ के जैसे अभी घोँसलोँ मेँ
नयी भोर है तो चहकने को कुछ है

Saturday, June 25, 2011

सह-जीविता

स्वकीयता और परकीयता -
पारस्परिक वैलोम्य में अवगुण्ठित दो भाव,
एक-दूसरे की वैयक्तिकता की गरिमा का
सम्मान करते हुए,
अपनी शुचिता की मर्यादा में रहते हुए...
सर्वथा विपरीत,
किन्तु..एक-दूसरे के चिर-पूरक...
सदैव एकाकी,
किन्तु..स्वयमेव परिपूर्ण...
एक-दूसरे की विरोधी उपस्थिति के सत्य से अभिज्ञ,
किन्तु..आत्म-संतुष्ट...
एक-दूसरे के परिमाण द्वारा निर्णीत,
किन्तु..व्यापक...
बाँटते हुए एक सुखद अनुभव,
सह-जीविता का..!!

आओ सीखें...

Tuesday, June 21, 2011

यात्रा...


जीवन क्या है...???
एक निस्सार यात्रा,
जिससे अधिक सारगर्भित कुछ भी नहीं.
निस्संदेह, 
हम जीते हैं--
एक चिर-विचारशील अवस्था में
जहां सभी बंधन
बंधहीन हो जाते हैं;
एक चिरंतन, शाश्वत तत्व का साक्षात्कार होता है,
प्रतिपल,
किन्तु
कोई अनजाना-सा गुबार
जैसे मानस को ढक लेता है
और....
आँखें बाध्य हो जाती हैं
आगे न देख सकने के लिए;
फिर..?
इस बाध्यता की पराकाष्ठा....
उस बिंदु पर
जहां अपरिमित अन्तर्निहित है,
जहां वे सब कुछ देखने को स्वतन्त्र हैं..
कैसा अजीब विरोधाभास...!!
किन्तु सत्य....!!!

Saturday, December 06, 2008

जीवन-पथ

रे मन! जीवन-पथ बहुत कठिन है
कभी स्वच्छ, यह कभी मलिन है

आज हृदय रक्ताभ हो उठा मेरा
रक्तिम नयनों में आज रिक्तता छाई
कहाँ गयीं बचपन की वे आशाएँ?
कहाँ गयी यौवन की वह अँगड़ाई?
आज न रातें और न दिन हैं
रे मन! जीवन बहुत कठिन है

मानस में मेरे उथल-पुथल है छाई
इक नयी नाव, इक नयी नदी खे लायी
मझधार बीच नैया हिचकोले खाए
अनजान खिवैया खोज-खोज भरमाये
सलिल हुआ जाता विपथित है
रे मन! जीवन बहुत कठिन है

बचपन में मैंने देखी थी अमराई
इक झुकी डाल मेरे सपने में आयी
थे लदे आम मीठे उस पर बहुतेरे
पर चली अचानक गयी स्तब्ध पुरवाई
आता क्यों दिवा-स्वप्न प्रतिदिन है?
रे मन! जीवन बहुत कठिन है

लगे प्रभाकर आज पिघलने यों ही,
लगे हिमाचल-शिखर उबलने क्यों ही?
चाँदनी आज अङ्गारे बरसाती है,
चातकी रात सोने को भी जाती है!
आज यकायक थमा अनिल है
रे मन! जीवन बहुत कठिन है

उषा आज रवि-पथ लख सकुचाती है
लालिमा देख कर वसुधा घबराती है
जाने क्यों गोधूलि-अर्चना-वेला
विधु के स्वागत में नहीं नज़र आती है
प्रहर आठ बीतने कठिन हैं
रे मन! जीवन बहुत कठिन है

सम्बन्धों में निस्सार मूकता छायी
मित्रता रत्न-सम ख्याति छोड़ अकुलायी
हुए देव व्याकुल आहुति पाने को
जगती की वणिक्-वृत्ति रङ्ग ले आयी
संसृति एक अगण्य गणित है
रे मन! जीवन बहुत कठिन है

मेरी वह उल्लास-प्रबलता खोय
यह दशा निरख उल्लसित विकलता रो
अब विस्मृति भी अवसाद मिटा ना पाए
नीरवता भी चुपचाप यहीं पर सोयी
आज व्यथा ही स्वयं व्यथित है
रे मन! जीवन बहुत कठिन है
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