Saturday, June 25, 2011

सह-जीविता

स्वकीयता और परकीयता -
पारस्परिक वैलोम्य में अवगुण्ठित दो भाव,
एक-दूसरे की वैयक्तिकता की गरिमा का
सम्मान करते हुए,
अपनी शुचिता की मर्यादा में रहते हुए...
सर्वथा विपरीत,
किन्तु..एक-दूसरे के चिर-पूरक...
सदैव एकाकी,
किन्तु..स्वयमेव परिपूर्ण...
एक-दूसरे की विरोधी उपस्थिति के सत्य से अभिज्ञ,
किन्तु..आत्म-संतुष्ट...
एक-दूसरे के परिमाण द्वारा निर्णीत,
किन्तु..व्यापक...
बाँटते हुए एक सुखद अनुभव,
सह-जीविता का..!!

आओ सीखें...

14 comments:

  1. बहुत खूबसूरत शब्दों में सह जीविता का पाठ पढाया ..

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  2. सीखना जारी है और हर कदम पर कुछ न कुछ सीख रहे हैं. हर लम्‍हा हमें कुछ सिखाता है. आपने सुंदर लिखा.

    दुनाली पर देखें
    बाप की अदालत में सचिन तेंदुलकर

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  3. कृति मे उधृत भावों की वास्तविक जीवन से सह- जीवित... आओ सीखें !!! प्रशंसनीय गठन, सुन्दर रचना .

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  4. बहुत बहुत धन्यवाद मेरे ब्लॉग तक पहुँचाने के लिए ...!!
    आपका लेखन भी उत्कृष्ट है ...!! बहुत अच्छा लगा पढ़ कर ...!!
    अनेक शुभकामनायें ...!!

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  5. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 28 - 06 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच-- 52 ..चर्चा मंच

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  6. सहजीन का यह भाव सीखते रहना होगा, सुन्दर शब्दकारी।

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  7. मित्र ,शब्द शिलाओं का समुन्नत प्रयोग ऐसे करेंगे तो ताजमहल का क्या होगा ? ए अच्छी बात नहीं . अस्तित्व बचा रहने दो भाई .... / संयत साहित्य विधा का कुशल प्रदर्शन सराहनीय है जी /बहुत -२ बधाई ...

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  8. बहुत बढ़िया...

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  9. बहुत सुन्दर ... सहजीविता के भाव समेटे अति उत्तम अभिव्यक्ति ..शुभकामनायें ...

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  10. वाह .. बहुत बढि़या ।

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  11. वाह ……………बहुत सुन्दर ढंग से पाठ पढाया है…………अति सुन्दर्।

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  12. Hi.. very informative post.

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आपके विचार ……

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